स्व. राणा प्रताप सिंह ( बाबू जी )

श्रध्देय बाबू जी - स्व. श्री राणा प्रताप सिंह
एक संक्षिप्त जीवन परिचय

गहन अनुभूतियों को शब्द में बांधना बडा कठिन सा लग रहा है। प्रायः वर्तमान से सभी अवगत रहते हैं और अनदेखे अनकहे अतीत से अनभिज्ञ रहते हैं। मैं सोचता हूं कि पूज्य बाबू जी की जीवन यात्रा उदगम और समापन की राह के बारे में उनके शुभचिन्तकों को कुछ बता दूं जैसा मैने जाना है और सुना है।

बाबू जी का जन्म ग्राम बेलहरी जिला-बलिया के एक जमींदार परिवार में 23 दिसम्बर 1923 ई० को हुआ था। हमारे दादा जी बिहार पुलिस सेवा में दरोगा थे। जब बाबू जी मात्र 8  वर्ष के थे हमारे दादा जी का टायफ़ायड बीमारी से निधन हो गया। हमारे बाबू जी के चार बहनेण और तीन भाई थे। भाइयों में वे मंझले थे। दोनो भाई पुलिस सेवा में थे। सबसे बडे बिहार पुलिस में दरोगा के पद से सेवा निवृत्त हुए तो छोटे उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में उपअधीक्षक के पद से सेवा निवृत्त हुये।

बाबू जी का बचपन उनके चाचा श्री देवनाथ जी की छत्र्छाया एवं पुजनीया चाची के स्नेहिल सानिध्य में बीता। बाबू जी को ही उन लोगो ने अपना पुत्र मान लिया था। जिस स्नेह से चाचा और चाची ने उन्हे पाला था उसी सम्मान श्रद्धा से बाबू जी ने उन्हे प्रतिसाद दिया। क्षत्रिय कल्याण सबा, भिलाई नगर के तत्वाधान में स्व. देवनाथ की स्मृति में एक पुरस्कार का आयोजन भी बाबू जी ने किया है जो आज भी पूर्ववत दिया जा रहा है।

बाबू जी की प्रारम्भिक शिक्षा-दिक्षा उदय प्रताप क्षत्रिय कालेज वाराणसी में हुई थी। यह एक आवासीय कालेज था जहां पर सहगामी पाठ्यक्रम में घुडसवारी आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। उनकी छठवीं से बारहवीं (इंटर)  तक की शिक्षा उदय कालेज में हुई। इन्टर के बाद बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर एवं एल.एल.बी की उपाधियां उन्होने ग्रहण की।

अकादमिक शिक्षा पूर्ण कर लेने के बाद बाबू जी ने कुछ माह तक रानीगंज के एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य किया। उन्होने कानून शिक्षा की भी उपाधि ली थी। अतः वे बलिया के न्यायालय में वकील हो गये और लगभग 4 वर्ष, 1952 ई० से 1952 ई० तक वहां रहे। उसी समय बाबू जी को दो जगहों का आफ़र मिला एक उत्तरप्रदेश सरकार में नायब तहसीलदार पद का और दूसरा धनबाद के कोलमाइन्स में लेबर वेलफ़ेयर आफ़ीसर का। उन्होने कोलमाइन्स की सेवा को वरीयता देते हुए वहां अपनी पदस्थापना लेली।

सन 1959 में भिलाई इस्पात संयंत्र में वे लेबर वेलफ़ेयर आफ़िसर के पद पर नियुक्त हो गये। बाबू जी ने समाजशास्त्र में स्नाकोत्तर उपाधि प्राप्त की थी। अतः प्रारम्भ से ही वे समाजवादी विचारधारा से अनुप्रेरित होते रहे। इसी कारण उन्होने अधिकारी होते हुए भी श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया। सही अर्थों में वे श्रमिक कल्याण अधिकारी थे। जिसके लिये उनका चयन हुआ था। प्रायः प्रशासन एवं श्रमिकों के बीच टकराव हो ही जाता था बाबू जी ने न्याय के पथ पर चलते हुए श्रमिकों का उचित पक्ष लिया- यही उनके पद की सार्थकता थी। इस प्रकिया में कभी-कभी उच्च प्रशासन से उनकी झडप भी हो जाती थी। किन्तु वे इसकी चिन्ता न करते हुये श्रमिक कल्याण की बातें करते थे।

दूसरोंकी सहायता करना उनके लिये धार्मिक कार्य के बराबर था। उत्तर प्रदेश और बिहार के सैकडों लोगों को उन्होने भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी दिलाई। इस कार्य में उन्होने जाति और धर्म को प्रश्रय नही दिया। जो भी आया उसकी सहायता उन्होने की।

महिला जागरण के वे विशेष पक्षधर थे। उनकी मान्यता थी कि महिलाओं को उच्च शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। उन्होने अपनी बहुओं को अपना अध्ययन निरन्तर बनाये रखने के लिये अभिप्रेरित किया। मेरी बडी भाभी डा. विभा सिंह उन्ही की प्रेरणा से डाक्टर आफ़ फ़िलासफ़ी की उपाधि प्राप्त कर सकीं।

बाबू जी ने धर्म के मूलतत्व को अंगीकार किया था। धर्म के आडम्बर और दिखावे में उनका विश्वास नही था। वे मा दुर्गा के अनन्य उपासक थे। इसी आस्था के वसीभूत उन्होने अपने गृ ग्राम बेलहरी में मां दुर्गा के एक मंदिर का निर्माण कराया। आज भी महत्त्वपूर्ण धार्मिक परम्पराओं के निर्वाहन के लिये हमारा पूरा परिवार मां दुर्गा की शरण में बेलहारी जाता है। उसी आस्था महाराणा प्रताप भवन परिसर में मां दुर्गा के मंदिर की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उडीसा के मां सम्बलेश्वरी मन्दिर, सम्बलपुर में उन्होने लग्न मंडप के लिए एक वर कक्ष का निर्माण कराया। नेहरु नगर के बंगाली बन्धुओं की एक संस्था मानव-मंडल है। बाबू जी की धर्म परायणता के कारण उन्हे वहां भी अध्यक्ष बनाया गया था। इस समिति के तत्वाधान में नेहरु नगर में काली मंदिर और शिव मंदिर का निर्माण हुआ। जिसमें बाबू जी की भूमिका प्रमुख थी

बाबू जी क्षत्रिय कल्याण सभा, भिलाई नग के अध्यक्ष दिस. 1995 से जीवन पर्यन्त थे। सभा और समाज के उन्नति के लिए उनका योगदान था, उनका क्या योगदान था इसकी व्याख्या करना मेरे लिये आत्मश्लजाधा के समान होगी। हां - इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि वे इस ढलती आयु में भी समाज के लिए इतनी भाग-दौड, इतना चिंतन और इतनी चिंता करते थे कि स्वास्थ के प्रति उदासीन हो जाते थे। इससे हम लोग कभी-कभी खीज भी जाते थे किन्तु वे तो अपने पथ पर अडिग राही थे।

बाबू जी 26 वर्ष की लम्बी सेवा के बाद 30  जून 1985 को भिलाई इस्पात संयंत्र के उप मुख्य कार्मिक प्रबन्धक पद से सेवा निवृत्त हो गये। सेवा निवृत्ति के बाद वे सामाजिक कार्यों में जुट गये।

बाबू जी का पारिवारिक जीवन अत्यन्त ही सुखद था। मेरी मां और बाबू जी के बीच ऐसा सामन्जस्य और ऐसी समरसता थी कि दोनो सही अर्थों में एक - दूसरे के पूरक थे। सौभाग्य से चार कंधों की अर्थी के लिये उनके चार बेटे ही पर्याप्त थे। मां की कोख पवोत्र करने के लिये एक बेटी भी परिवार में आ गई थी। मां और बाबू जी ने अपने जीवन काल में ही हम चारों भाइयों और बहनों का विवाह सुसंस्कृत परिवारों में कर दिया था। आज सभी परिवार, सुखी एवं आनन्द से हैं।

1 अक्टूबर 1998  ई० की रात्रि बडी दुर्भाग्यपूर्ण रही। बाबू जी की अध्यक्षता में अपने समाज ने अनेक कार्यक्रमों के साथ दशहरा उत्सव मनाया। मां भी पूरे कार्यक्रम में उपस्थित थी। रात्रि में अचानक हृदयाघात से चिकित्सालय पहुंचने से पहले ही रास्ते में मां के प्राण पखेरु उड गये। जीवन की सांध्य बेला में बाबू जी ही अकेले पड गये, टूटने लगे। अकेलापन हावी हो गई, स्वास्थ कुछ-कुछ गिरने लगा और बाबू जी भी 4 जनवरी 2001 की अर्ध्द रात्रि में हृदयाघात से ब्रम्हलीन होगये।

बाबू जी अपने पीछे एक सुगठित परिवार एवं प्रशंसकों की एक बडी टीम छोड गये हैं।

बाबू जी ने यह पोस्ट कार्ड गंगा प्रसाद जी को लिखा था।

समर्पित पूजनीय श्री राणा प्रताप सिण्ह के प्रति श्रद्धांजलि

श्रद्धेय शी राणा प्रताप जी की स्मृतियां मेरे जीवन की ऐसी धरोहर है जो बहुत ही अमूल्य है। वे मेरे इतने क्रीब हैं कि मैं उनके बिना अपना जीवन अधूरा पाता हूं। अपने जीवन के पुराने तारों को पुनः जीवित करने का प्रायास कर रहा हूं। राणा प्रताप जी के साथ मेरा परिचय बहुत ही पुराना था जबकि मैं सेक्टर 4 में था और वे नेहरु नगर में रहते थे। बहुत सहज व्यक्तित्व के धनी वे हमेशा हमारे घर आते थे और बडी तन्मयता के साथ बच्चन जी की मधुशाला सुनते थे - " राह पकड तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला "। अपने जीवन में संघर्ष की आपाधापी में तनिक भी विचलित होते हुये हमेशा अपने चेहरे पर हंसी व विश्वास का दीप जलाते हुए वे ऐसे मिलते थे कि उन क्षणों को याद कर आज भी मन रोमांचित हो उठता है। चूंकि वे कार्मिक विभाग में थे, उनका समाज बहुत बडा था। बहुत से लोग उनके पास आते थे पर कभी उनके चेहरे पर न तो शिकन न चिंता थी। हृदय तो आकाश की भांति विशाल था जहां पर सभी थोडी देर विश्राम कर लेते थे। लोगो की नौकरीके लिये उनके हृदय का दरवाजा हमेशा खुला रहता था। छोटें हो या बडे सबके लिये वे हमेशा मसीहा थे जिनका कार्य करके वे बहुत खुश रहते थे। उनका प्रेम तो ऐसा उमडता था जैसे बरसात में नदियों में कोई सीमा नही रहती। धीरे-धीरे समय के चक्र में रिटायर हुए - उसके बाद उनके मन में समाज में क्षत्रियों की एक पहचान बनाने का संकल्प उठा। यह एक अति कठिन कार्य था लेकिन जन मानस के प्रति प्रेम पर उन्हे इतना विश्वास था कि यह सब कार्य बडे ही सहज भाव से वे कर सकते थे। मैं जानता हूं कि हमेशा मेरे बडे भैया की तरह मुझे बडी खुशियों की आशा लिए अपनी योजना बताते थे और मेरे सहयोग का संकेत करते थे। यह उनका अधिकार था। आज भि उनका और भाभी जी का सहज व्यक्तित्व मेरे जीवन पथ पर एक आदर्श की तरह आलोकित करता है। मैं उन लोगो के प्रेम के प्रति हमेशा ऋणि रहूंगा।

पंचानन सिंग

27/6, नेहरु नगर ( पश्चिम ) भिलाई

बाबू जी

"जो साथ रहे हर लम्हों में सादा, सच्चा, सरुप सही,

हे पिता! नमन करते हैं तुम्हे बच्चे तेरे नादान वही"

कहते हैं विश्व रचयिता सृष्टिकर्ता विधाता जब सबसे अधिक आन्नदित होता है वह आत्मविभोर  होकर ऐसी श्रेष्ठ कृति बनाता है जिस कृति से सांसारिक जग कृतार्थ हो जाये और जब किन्ही कारणों से रुठा होता है तो ऐसे लोगो को आकार प्रदान करता है जिसकी प्रवृत्ति दूसरों को कष्ट व दुःख में देखकर मुस्कुराने की होती है और जो इन्ही आकृतियों से उत्कृष्ठ कार्य कराकर उन्हे सहज मानव बना देने का प्रयास करता है वही इश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति होता है। उसे ही कहा जाता है। नेकनीयत, उदार, सहिष्णु व संवेदनशील इंसान।

जिस मानव में ऐसे गुण हो जो उसकी विशेषता के कारण उसे औरों से दर्जें में श्रेष्ठ रखते हो, ऐसे गुणवान मानव हीदेव तुल्य हो जाते हैं। जीवन घोर प्रपंचों व बहुत से कष्टप्रद उतार चढाव की योजनाओं से भरा एक सरोवर है। जिसमें अनेकों कष्ट व जिखिम उठाने के बाद केन्द्र में उगे हुए यश और मोक्ष के सरोवर तक पहूंचाना होता है। यह दुष्कर कार्य धैर्यवान व साहसी व्यक्ति का ही हो सकता है। मनुष्य की छोटी - छोटी बातें, छोटे - छोटे क्षण ही उसके व्यक्तित्व की झलक बना देते हैं, मनुष्य जीवन के झंझावात को कितने धैर्य से सहता है यही तो उसके दृढसंकल्प की परीक्षा होती है।

कुछ व्यक्ति ऐसे ही होते है जो जीवन को आशावादी दृष्टिकोण से देखते हैं और इसी आशा का संचार दूसरे के जीवन में भी करते हैं। और जो व्यक्ति दूसरे के निरस जीवन में उत्साह ला दे, अज्ञानता के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से चौंधिया दे, निराशारुपी  भंवर से निकालकर आशा के किनारे ला खडा करें वही महापुरुष है।

जीवन एक महासंग्राम है जिसमें हर किसी को अपनी लडाई स्वयं लडनी होती है पर यदि कोई मार्गदर्शक बन आपको सही युक्ति से जुझने की प्रेरणा दे तो आप अपने महासंग्राम में अवश्यंभावी विजेता हो जाते हैं। कुछ एअहापुरुष ऐसे ही होते हैं जो न केवल अपनी वाणी से वरन अपने कर्मों से भी दूसरों को प्रेरणा प्रदान करतें हैं। उन्हे पशु रुपि स्वार्थ छू तक नही जाता। वे समाज, देश व मनुश्य के लिये ही बनाये होते हैं। उन्हे किसी भी इंसान की तकलीफ़ अपने दुख से कहीं ज्यादा सताती है। उनके हृदय में दूसरों के लिये दर्द व स्नेह सदा बना रहता है। ऐसे उच्च गुणों से युक्त दिव्य पुरुष थे मेरे बाबू जी श्री राणा प्रताप सिंह। आज उनकी स्मृति में भाव विहल होकर मैं इस लेखनी को गति दे रही हूं, उनके गरीमामय व्यक्तित्व और सहज सरल स्वभाव को अमरण करके ही उनके सद्कार्यों व सदभावना का अनायास ही जिक्र हो जाता है।

मेरे जीवन में कई मायनों में वे प्रेरणा श्रोत रहे हैं। एक पुरुष होते हुए भी वे नारी के दुखों और समाज द्वारा नारी को प्रताडित किये जाने वाले उत्पीडन को एक पिता की तरह सहज भाव से समझते थे। वे नारी को श्रद्धेय मानते थे। उनका मानना था कि संसार में ईश्वर के बाद परमपूज्य नारी होती है जिस पर प्रकृति ने अपना सर्वश्व निछावर किया है। उसे अपमानित करना देवताओं को रुष्ठ करना है। जिस व्यक्ति की मानसिकता इतनी उत्कृष्ठ हो वह वाकई देव तुल्य है। नारी शिक्षा, नारी उत्थान व नारी के व्यक्तित्व के चहूंमुखी विकास के लिये वे सदा संघर्षशील रहे। यदि किसी नारी ने उन्हे अपनी समस्या बतायी तो उसके कष्टों का विवेकपूर्ण निवारण कर उन्होने सदैव उचित न्याय दिलवाया है। आज मुझे जो समाज डा. श्री मती विभा सिंह के नाम से ससम्मान पुकारता है, मेरे उस डाक्टरेट की डिग्री का श्रेय भी मेरे पुज्य बाबू जी का ही है। उन्होने मुझे पी.एच.डी. करने की प्रेरणा दी। उन्होने घर और बाहर नारी का सम्मान बरकरार रखा।

मैंने कितनी बार ही देखा है कि गर आये अतिथि चाहे वह कितना ही छोटा कर्मी क्यों ना हो उनका स्वागत उतना ही माधुर्यता और स्नेह से दरते थे जितना की औरों का। हालांकि बाबू जी उच्च पदधिकारी थे किन्तु कभी भी और कहीं भी उनके अहम दृष्टिगत नही होता था और शयद यही सादगी और स्नेहिल स्वभाव उन्हे अमर बना गया।

हाथ कंगन को आरसी क्या ? क्षत्रिय कल्याण सभा भिलाई का महाराणा प्रताप भवन और मंदिर मेरे पूज्य बाबू जी की प्रेरणा, स्नेहशीलता व जुझारु मार्गदर्शन का फ़ल है। आज हम इस सामाजिक संस्कृति की विशाल छत के नीचे धर्म व नीति युक्त पर्व मना रहे हैं तो मुझे लग रहा है कि मेरे बाबू जी यहीं कहीं पास ही खडे हैं और प्रत्येक व्यक्ति का मार्गदर्शन करा रहे हैं। मुझे यह लिखने भी स्म्कोच नही कि छोटी उम्र का बौनापन जिसे कहते हैं वहीं अहम मुझमें कभी था जिसे मेरे बाबू जी ने बडे प्यार और मनुहार से मार्गदर्शन कर मेरे व्यक्तित्व को बहुआयामी प्रेरणा दी है। मैने बहुतेरे महापुरुषों की जीवनियां पढी है पर उमनेम बहुत कम ही अपनी वाणी को कार्यरुप में चरितार्थ कर पाये हैं। मेरे बाबू जी उन थोडे से लोगो में थे जो अपनी बातों के धनी थे और जो कहते थे वह कर दिखाते थे।

वे सदैव यही कहा करते थे कि मनुष्य जन्म लिया है तो यह सोचो की उससे कहीं न कहीं किसी का भला हो जाये।

मुझमें बहुत से वैचारीक परिवर्तन आये। पहले से कहीं ज्यादा धैर्य व सहनशीलता विकसीत हुई है, इन सबका श्रेय मैं अपने बाबू जी को देती हूं और मै यही चाहती हुं कि उन्हे जो कोई भी जानता है उनका बाबू जी के प्रति सच्चा श्रद्धा सुमन तब अर्पण होगा जब वे बाबू जी के पद चिन्हों को व उनकी प्रेरणाओं को आत्मघात कर लेंगे। उन्हे समर्पित है श्रद्धा के फ़ूल मेरे इन विनम्र शब्दों में -

याद आ रहे है मुझे

वे भूले-बिसरे सतरंगे पल

जब सहमी सकुची सी पार की थी

अपने ससुराल की चौखट

और पाया था उसी पल

सशक्त स्नेह ममता से पगे

हाथों से सौभाग्य का आशिर्वचन

"बेटी" का वात्सल्यपूर्ण सम्बोधन।

जीवन में जब-जब घिंरी

समस्याओं की काली - घटाएं

प्रकाश की किरण बनकर

वे हमें दि्खाते थे राह,

पढाया हमें ससुराल में ओजवान

प्रकाशवान बने रहने का पाठ।

मेरी हर सफ़लता का श्रेय है

मेरे श्रद्धेय बाबू जी को ही।

कहने के लिए वे अब "स्वर्गीय" हैं

कभी हमें नही मिल पाएगा उनका दर्शन

पर हमारे लिए वे जीवित हैं,

वे जीवित हैं हमारी आत्मा में

वे जीवित हैं हमारे अंकल्पों में

वे जीवित हैं हमारे कर्तव्यों-कर्मों में।

वे केवल अपने परिवार के होने के कारण

मेरे हितैषी, शुभेच्छु, मार्गदर्शक नही थे,

वे चाहे थे समाज की महिलाएं, कन्यायें,

आगे बढे, और जीवन के हर क्षेत्र में

उन्नति के शिखरों तक पहुंचे।

स्वत: प्रेरित होकर वे तलासते थे

हर ऐसे अवसर जहां समाज की

बहु-बेटियां प्रस्तुत कर पाएं

अपनी कला अपनी दक्षता और अपने संस्कार।

इनमें कोई निजी स्वार्थ नहीण था उनका

थी तो उनकी सोच, उनकी समझ

कि जिस गर समाज में नारियां

शिक्षा और संस्कार के जला देती हैं दीपक

वह घर, समाज ही बनाता है स्वर्ग।

इस प्रथम पुण्य तिथि पर

नमन करती हूं अपने ऐसे बाबू जी को

इस संकल्प के साथ

कि हम खरे उतरते रहेंगे हर शिक्षा में

और जलाए रहेंगे वह मशाल

जो आप सौंप गये हैं हमें धरोहर के रुप में।

डा. विभा सिंह

1/बी., सडक-31 सेक्टर - 9, भिलाई नगर

"सहृदयता की साक्षात मूर्ति थे बाबू जी"

यह घटना 1998 या 99 के एक परिवार की है। मैं तारीख और महीना भूल रहां हूं क्योंकि उस समय की बात उसी समय समाप्त हो गई थी और उसे याद रखने के लिये कोई कारण भी नहीं था। पर आज जब बाबू जी हमारे बीच नहीं हैं तब वह घटना मुझे अक्सर याद आ जाया करती है।

रविवार का दिन था। रविवार के दिन सामान्य रुप से क्षत्रिय कल्याण सभा के सभी कार्यकारिणी सदस्य भवन स्थित कार्यालय में आते हैं। एक बजे के लगभग जब लोग कार्यालय से निकल कर अपने-अपने घर जाने की तैयारी कर रहे थे एक व्यक्ति बहुत अस्त-व्यस्त हालत में रोते हुए आया कहने लगा "मैं एक गरीब क्षत्रिय हूं। मेरी पत्नी ख्ना बनाते समय जल गई है मैं उसे सेक्टर 9 अस्पताल में भर्ती कर आया हुं। डाक्टरों ने भर्ती तो कर लिया है पर शा्म तक दो हजार रुपये इलाज के लिये जमा कर देने को कहा है। इतनी बडी रकम कहां से लाऊं। यहां क्षत्रिय कल्याण सभा का बोर्ड लगा देखा तो आप लोगो के पास सहायता मांगने आ गया हूं। आप लोग मेरी पत्नि को बचा लीजिए।

अक्सर ऐसे बहाने बनाकर लोग ठगी भी करतें हैं, इसलिये उसकी बातों की अनदेखी करके सब लोग जाने लगे। मैने बाबू जी से कहा, " पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि यह आदमी सच कह रहा है"। बाबू जी ने कहा कि "तुम एक काम करों। उसके पीछे जाकर सच्चाई का पता लगाओं और गर पर आकर मुझे बताओं"। मैनें वैसा ही किया। उसके पीछे-पीछे गया। उसके पास-पडोस से पता किया । दिनेश कुमार नाम का वह व्यक्ति लक्ष्मी नगर (सुपेला) में रहता था। वह सचमुच क्षत्रिय था । बिहार का रहने वाला था।ठेला चलाकर किसी तरह गुजर कर रहा था। उसकी पत्नि आरती देवी सचमुच खाना बनाते समय जल जाने के कारण अस्पताल में भर्ती होने गई थी। मैंने बाबूजी के घर गर जा कर पूरी जानकारी सही-सही दे दी। संयोग ऐसा हुआ कि उस दिन बाबू जी के पास भी रुपये नही थे। उन्होने अपनी बहू से पूछा कि क्या तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं। बहू के पास पांच सौ रुपये थे जो लाकर बाबू जी को दे दिया। बाबू जी ने वे रुपये मूझे दे दिये और कहा कि विनोद और लोगो से भी संपर्क करों और जैसे भी हो शाम तक दो हजार रुपये अस्पताल में जमा कर दो। मैंने और भी क्षत्रिय भाईयों से संपर्क किया। सभी ने कुछ न कुछ योगदान किया। रुपयों का पूरा इन्तजाम हो गया। मैं उस व्यक्ति ( दिनेश कुमार ) के जोपडीनुमा घर पर गया, उसे साथ लिया और अस्पताल जाकर इलाज के लिये राशि जमा करा दिया। उसकी पत्नि बच गई। वह अपनी पत्नि की जिन्दगी के लिए समाज का आभार मानता है। कभी-कभी यहां आता भी है।

यह सब संभव हि सका बाबू जी के सहृद;अता के कारण। यदि वे भी उस व्यक्ति की अन्देखी कर चले गये होते तो उस क्षत्रिय भाई की पत्नि का इलाज नही हो पाता और ऐसा होना हमारे समाज के माथे पर कलंक का टीका बन गया होता। उनकी सहृदयता और दूसरे क्षत्रिय भाइयों से मित्र सहयोग से ह्म एक निःसहाय क्षत्रिय भाई की सहायता कर पाए, इस पर आज हमें संतोष है।

विनोद सिंह
33/A, रुआबांधा, भिलाई नगर

" हम युवकों के लिये प्रेरणा स्त्रोत थे"

हमारे पूर्व अध्यक्ष राणा प्रताप सिंह जी हम युवाओं के लिये प्रेरणा स्त्रोत थे। वे हमारे सामने अवर्गीय कृष्णपाल सिंह जी का उदाहरण देते थे कि वे समाज के पर्त जितने समर्पित और अनुशासित थे उसी तरह की समर्पण और अनुशासन की भावना वाले वयक्ति मिल कर ही क्षत्रिय कल्याण सभ, भिलाई को देश का सबसे सुगठित और आदर्श क्षत्रिय संगठन बना सकते हैं। आज वैसी प्रेरणा देने वाला कोई संरक्षक हमारे बीच नहीं है।

सुनीत सिंह
5/C, सडक - 72, सेक्टर-6, भिलाई नगर

"पीडा किसी की हो, दिल उनका दुखता था"

क्षत्रिय कल्याण सभा, भिलाई के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय राणा प्रताप सिंह जी जब सभा से पूरी तरह सक्रिय रुप से जुडे इसके पहले समाज का गठन और पंजीयन हो चुका था। सभा के लिये भिलाई इस्पात संयंत्र से भूमि प्राप्त कर उसका पंजीयन भी कराया जा चुका था, पर आगे काम कैसे बढे, यह समझ में नहीं आ रहा था। आपस में एकअप्रिय विवाद की स्थिति बन गई थी। ऐसे समय में राणा प्रताप सिंह जी समाज से जब जुडे तब उनके कुशल नेतृत्व में महाराणा प्रताप भवन के निर्माण का काम तेजी से चल पडा। जो टीम पहले क्षत्रिय कल्याण सभा की स्थापना के कार्य में जुटी थी, वह नए उत्साह से काम करने लगे। आर्थिक दृष्टि से सक्षम लोगों ने अपनी इच्छा से एक-एक काम पूरा कराने का संकल्प लिया। देखते - देखते एक भव्य भवन बन कर खडा हो गया। ्भवन निर्माण के लिये धन-संग्रह के लिए राणा प्रताप सिंह जी के भी साथ किसी भी समय कहीं भी जाने के लिए तैयार रहते थे।

यह तो था उनका एक रुप, लेकिन इससे भी अधिक मैं उनके दूसरे रुप से प्रभावित हूं। वह रुप है उनकी इन्सानियत का। सभा के महाराणा प्रताप भवन का उपयोग लोग सामाजिक कार्यों के लिए करते हैं। इसके लिए वे कई महिने से पहले से भवन के आरक्षण शुल्क पटाकर आरक्षण करा लेते हैं। कभी - कभी किन्ही कारणों से वे आरक्षण निरस्त कराने के लिए अनुरोध करते हैं। इसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं कि आरक्षण तिथि के कितने दिन पहले आरक्षण निरस्त कराने पर कितनी राशि काटकर शेष राशि आवेदन कर्ता को वापस कर दी जाएगी। आरक्षण तिथि यदि केवल पन्द्रह दिन बाद रह गई हो तो आधी राशि काट कर आधी वापस किये जाने का नियम है। एक बार ऐसा हुआ कि एक आदमी ने अपनी बेटी क्स ब्याह के लिए भवन आरक्षित कराया। दुर्भाग्य से विवाह के तिथि के कुछ दिन पहले वर पक्ष में किसी की मृत्यु हो गई इसलिए विवाह स्थगित कर दिया गया। कन्या के पिता यह कारण दर्शाते हुए आरक्षण निरस्त करने हेतु आवेदन किया। चूंकि विवाह की तिथि निकट आ चुकि थी। इसलिए आधी राशि काटकर आधी वापस की जानी थी। कोषाध्यक्ष आर,एन. सिंह ऐसा करने जारहे थे। रविवार का दिन होने के कारण दूसरे पदाधिकारी और कार्यकार्यकारिणी सदस्य भी कार्यालय में उपस्थित थे। राणा प्रताप सिंह जी भी आवेदक का निवेदन सुन चुके थे। उन्होने कहा कि "यह आरक्षण एक असमान्य स्थिति में निरस्त हो रहा है, इसलिए हमें कन्या के पिता के आवेदन पर सामान्य नियमों के तहत नहीं बल्कि सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। मेरा सुझाव यह है कि इस प्रकरण में नियम शिथिल करते हुए पूरी राशि कन्या के पिता को वापस कर देनी चाहिए"। सबकि सहमति लेकर उन्होनेण? आवेदन पत्र पर इस आशय की टिप्पणी लिख कर कोषाध्यक्ष को दे दिया। उनके अनुसार कन्या के पिता को सहानुभूतिपूर्वक पूरी राशि वापस कर दी गई। नियम के ऊपर इन्सानियत को वरीयता देने वाला उनका रुप मैं कभी भूल नहीं सकता।

गुलाब सिंह
13/B सडक - 6 , सेक्टर - 4
भिलाई नगर

जितना शानदार था उनका शरीर गठन और व्यक्तितो उतना ही शानदार था उनके बात-चीत और व्यवहार का अंदाज। राजसी था उनके भोजन और रहन - सहन का ढंग और राजपूती गरिमा से भरी रहती थी उनकी सोच - समझ औ उनके कार्य। पर इस सबके बावजूद भिलाई के छोटे - बडे सभी क्षत्रिय परिवारों के लिए वे थे मात्र "बाबू जी" और सभी क्षत्रिय बंधु उनके सगे आत्मीय।

दुखहरण सिंह
प्रबंधक

मां जगदम्बिका एवं प्रतापेश्वर महादेव मंदिर

महाराणा प्रताप भवन परिसर, भिलाई

"बच्चों और महिलाओं के सच्चे शुभेच्छु थे स्वर्गीय बाबू जी"

स्वर्गीय राणा प्रताप सिंह जी की इच्छा यह थी कि क्षत्रिय परिवारों की महिलाऐं और युवजन आगे आयें और समाज के कार्यों में कार्य में आगे बढ कर हिस्सा लें। उनकी प्रेरणा से ही समाज के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के लिए "प्रतिभा - प्रोत्साहन पुरस्कार" दिये जाने की एक नयी योजना प्रारंभ की गई। वे क्षत्रिय छात्र-छात्राओं के मार्गदर्शन के लिये महाराणा प्रताप भवन में कोचिंग क्लास प्रारंभ करना चाहते थे। जिसे आगे चलकर तकनीकी शिक्षा संस्थान का रुप दिया जा सके। पर उनकी यह इच्छा पूरी होने से पहले काल के क्रुर हाथों ने उन्हे हमसे छीन लिया। मैं नहीं जानती कि उनके सपने पूरे कब कर पाएंगे, पर यह सच है कि महाराणा प्रताप भवन को अन्य कार्यों के अलावा शिक्षा और संस्कृति का मार्गदर्शन केन्द्र बनाकर ही क्षत्रिय कल्याण सभा, भिलाई अपने नाम और अस्तित्व को सार्थक कर पाएगी।

सुश्री शांति क्षत्रिय
11/A, सडक - 38, सेक्टर - 4,
भिलाई नगर

"उनके व्यक्तित्व में एक सहज चुम्बकीय आकर्षण था"

क्षत्रिय कल्याण सभा, भिलाई नगर के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्री राणा प्रताप सिंह जी जैसे धीर वीर और गम्भीर व्यक्ति किसी भी समाज के लिए गौरव का कारण होते हैं। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा चुम्बकीय आकर्षण था कि लोग उनके संपर्क में आते ही उनके मुरीद हो जाते थे। उनके निधन से समाज में जो रिक्तता आई है उसे भर जाने में हममें से कोई भी समर्थ नहीं है। उनकी पहली पुण्य तिथि पर हम उन्हे श्रद्धापूर्वर स्मरण करते हैं।

भवानी सिंह
9, कैलाश नगर, भिलाई